नोट से नेटवर्क तक पहुंचा भारत, यूपीआई ने बदला पैसे के लेनदेन का गणित, नकदी के बजाय मोबाइल से होने लगा लेनदेन

गाजियाबाद। एक समय था जब पैसा जेब में रखे नोटों को माना जाता था। एक हजार रुपये का भुगतान करना हो तो नोट गिने जाते थे, एक लाख रुपये के लिए नकदी की व्यवस्था करनी पड़ती थी और बड़े कारोबारी भुगतान के साथ सुरक्षा की चिंता भी जुड़ी रहती थी। आज मोबाइल फोन की स्क्रीन पर कुछ ही सेकंड में रकम एक खाते से दूसरे खाते तक पहुंच जाती है। वित्तीय सलाहकार रविंद्र तिवारी के अनुसार यह बदलाव केवल तकनीक का परिवर्तन नहीं है, बल्कि भारत की आर्थिक और भुगतान व्यवस्था में आया बड़ा बदलाव है। रविंद्र तिवारी बताते हैं कि एक नोट के छपने से लेकर आम आदमी की जेब तक पहुंचने के बीच लंबी प्रक्रिया होती है। बैंक नोटों की छपाई के बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से मुद्रा भंडारों तक पहुंचाया जाता है। वहां से बैंक शाखाओं और एटीएम के माध्यम से नकदी लोगों तक पहुंचती है। पुराने और खराब नोटों को वापस लिया जाता है, उनकी जांच होती है और फिर उन्हें चलन से बाहर किया जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक नोटों की छपाई पर करीब 4,875 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके अलावा नकदी के परिवहन, सुरक्षा, भंडारण, एटीएम और नकदी प्रबंधन की भी लागत होती है। तिवारी के अनुसार डिजिटल भुगतान ने छोटे कारोबारियों के लिए रकम स्वीकार करना आसान बनाया है और बीमा तथा निवेश जैसी वित्तीय सेवाओं में भी डिजिटल संग्रह का महत्व बढ़ा है। हालांकि नकदी की जरूरत पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। आपदा, नेटवर्क समस्या, ग्रामीण बाजारों और कई अन्य परिस्थितियों में नकदी आज भी जरूरी है। इसलिए आने वाले समय की तस्वीर ‘नकदी रहित भारत’ से अधिक ‘कम-नकदी वाला भारत’ हो सकती है। उनके मुताबिक असली बदलाव यह है कि बड़े भुगतान का मतलब अब केवल नोटों का बंडल, बैंक की कतार और सुरक्षा की चिंता नहीं रह गया है। मोबाइल पर क्यूआर कोड के जरिए कुछ सेकंड में भुगतान संभव है। नोटों को छापने और सुरक्षित रखने की अपनी लागत है, वहीं डिजिटल भुगतान व्यवस्था को संचालित करने की भी लागत है। ऐसे में भारत की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां नकदी और डिजिटल भुगतान दोनों साथ रहेंगे, लेकिन रोजमर्रा के लेनदेन में डिजिटल माध्यम की भूमिका लगातार बढ़ती जाएगी। तिवारी के मुताबिक यूपीआई ने भुगतान की पूरी तस्वीर बदल दी है। अब सौ रुपये और एक लाख रुपये भेजने के लिए अलग-अलग संख्या में नोट रखने की जरूरत नहीं होती। रकम सीधे एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से पहुंच जाती है। हालांकि यूपीआई को लेकर फैलने वाले भ्रम को दूर करना भी जरूरी है। 15 सितंबर 2026 को सरकार की ओर से जारी स्पष्टीकरण के अनुसार व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले यूपीआई भुगतान निशुल्क हैं। किसी व्यक्ति को एक हजार या एक लाख रुपये भेजने पर केवल यूपीआई इस्तेमाल करने के कारण शुल्क नहीं लिया जाता। इसी तरह दो हजार रुपये तक के सामान्य व्यापारी यूपीआई भुगतान में भी शून्य व्यापारी छूट दर की व्यवस्था है। तिवारी के अनुसार व्यापारी छूट दर यानी एमडीआर को सरकारी ‘यूपीआई कर’ समझना सही नहीं है। कुछ निर्धारित व्यापारी लेनदेन पर यह भुगतान व्यवस्था की लागत के रूप में लागू होती है। पात्र व्यापारी लेनदेन में यह 0.40 प्रतिशत, अधिकतम 300 रुपये प्रति लेनदेन तक हो सकती है। यानी एक लाख रुपये के पात्र व्यापारी भुगतान पर 0.40 प्रतिशत की गणना 400 रुपये होती है, लेकिन अधिकतम सीमा के कारण एमडीआर 300 रुपये से अधिक नहीं होगा। यह ग्राहक से वसूला जाने वाला सरकारी कर नहीं है। रविंद्र तिवारी का कहना है कि बीमा क्षेत्र में भी यूपीआई ने प्रीमियम भुगतान को आसान बनाया है। पात्र बीमा व्यापारी भुगतान के लिए पांच रुपये प्रति लेनदेन की निश्चित एमडीआर व्यवस्था है। इसका अर्थ यह नहीं है कि 20 हजार रुपये का बीमा प्रीमियम जमा करने पर ग्राहक से पांच रुपये का ‘यूपीआई कर’ लिया जाएगा। यह भुगतान व्यवस्था से जुड़ी लागत है, ग्राहक पर लगाया गया कर नहीं। इसी तरह निवेश के क्षेत्र में भी डिजिटल भुगतान का महत्व बढ़ा है। म्यूचुअल फंड और प्रतिभूति से जुड़े पात्र यूपीआई भुगतानों के लिए 0.02 प्रतिशत एमडीआर, अधिकतम 300 रुपये प्रति लेनदेन की व्यवस्था बताई गई है। एक लाख रुपये के पात्र म्यूचुअल फंड लेनदेन पर यह राशि 20 रुपये बनती है। लेकिन इसे निवेशक पर लगाया गया सरकारी कर मानना सही नहीं होगा। तिवारी के अनुसार यूपीआई पर शुल्क को केवल भुगतान की राशि देखकर तय नहीं किया जा सकता। भुगतान व्यक्ति से व्यक्ति है या व्यक्ति से व्यापारी, व्यापारी किस श्रेणी में आता है, कौन-सा भुगतान माध्यम इस्तेमाल हो रहा है और लेनदेन की सीमा क्या है, इन सभी बातों का प्रभाव पड़ता है। इसलिए यह कहना कि एक लाख रुपये यूपीआई से भेजने पर निश्चित रूप से इतना कर लगेगा, अधूरा निष्कर्ष होगा। बड़ी रकम के भुगतान में बैंक और लेनदेन की निर्धारित सीमाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।



