गाजियाबाद

गरीब को सरकार ने घर दिया, अफसरों ने बुलडोजर चलाकर छीन लिया! हाईकोर्ट में मामला,  23 साल पुराने मकान पर चला बुलडोजर-सवालों के घेरे में अफसरों की कार्यशैली, वैध आवंटन था तो मकान अवैध कैसे और अवैध था तो 23 साल तक कार्रवाई क्यों नहीं?

गाजियाबाद। सरकार की गरीबों को आवास उपलब्ध कराने की योजना पर ही सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। मोदीनगर तहसील क्षेत्र के भोजपुर ब्लॉक स्थित ग्राम बेगमाबाद-बुदाना निवासी अनुसूचित जाति की महिला रानी पत्नी राजकुमार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को शिकायती पत्र भेजकर अपने मकान को कथित रूप से बुलडोजर से ध्वस्त किए जाने की शिकायत की है। पीडि़ता का आरोप है कि वर्ष 2002-03 में उसे इंदिरा आवास योजना के तहत वैध रूप से भूमि आवंटित की गई थी और इसी भूमि पर करीब 23 वर्ष से उसका पक्का मकान बना हुआ था। इसके बावजूद जुलाई 2024 में स्थानीय अधिकारियों ने कार्रवाई करते हुए मकान को ध्वस्त कर दिया। पीडि़ता ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि कार्रवाई के दौरान उसके परिवार का सामान भी गायब कर दिया गया। उसने मामले में भू-माफिया और स्थानीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत की निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष इस शिकायत में उपलब्ध नहीं है। रानी के अनुसार, बेगमाबाद स्थित खसरा संख्या 694/2 में 500 वर्ग गज भूमि उसे वर्ष 2002-03 में इंदिरा आवास योजना के तहत आवंटित की गई थी। आवंटन के बाद परिवार ने इसी भूमि पर पक्का मकान और चारदीवारी का निर्माण कराया और वर्षों से वहीं निवास करता रहा। पीडि़ता का कहना है कि सरकारी योजना के तहत भूमि मिलने के बाद परिवार ने यह मानकर अपना आशियाना बनाया कि आवंटन पूरी तरह वैध है। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि भूमि और उस पर बना मकान नियमों के विपरीत था तो सरकारी स्तर पर उसका आवंटन किस आधार पर किया गया और करीब दो दशक तक उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। वहीं यदि आवंटन वैध था तो बिना पूरी प्रक्रिया और जांच के मकान को ध्वस्त करने की कार्रवाई किस आधार पर की गई, यह भी पीडि़ता ने मुख्यमंत्री के समक्ष उठाया है। पीडि़ता का आरोप है कि नगर पालिका परिषद मोदीनगर के अधिशासी अधिकारी नरेंद्र मोहन मिश्रा, तत्कालीन तहसीलदार सचिन पवार, लेखपाल मोहित शर्मा तथा वार्ड नंबर 34 की सभासद सुशीला देवी और उनके पति संजय चौधरी की भूमिका इस पूरे मामले में संदिग्ध रही। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि भूमि नगर पालिका की सीमा से बाहर होने के बावजूद उसे वार्ड नंबर 34 ब्रह्मपुरी का हिस्सा दर्शाया गया और वहां ट्यूबवेल ऑपरेटर कक्ष के निर्माण के लिए टेंडर जारी किया गया। पीडि़ता ने मुख्यमंत्री को भेजे शिकायती पत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट में विचाराधीन रिट याचिका संख्या 2569/2024 का भी हवाला दिया है। उसका आरोप है कि मामला न्यायालय में विचाराधीन होने के बावजूद जुलाई 2024 में उसके मकान को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया गया। पीडि़ता का दावा है कि कार्रवाई के दौरान न्यायालय के आदेशों की भी अनदेखी की गई। शिकायत के मुताबिक, जब परिवार ने मकान तोड़े जाने का विरोध किया तो तत्कालीन नायब तहसीलदार पर कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर अपमानित करने का भी आरोप लगाया गया। पीडि़ता का कहना है कि उसे यह भी कहा गया कि अधिकारी हाईकोर्ट के आदेश से नहीं डरते। इन गंभीर आरोपों की भी जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। पीडि़ता का आरोप है कि कार्रवाई के बाद अधिकारियों की ओर से ऐसी आख्या तैयार की गई, जिससे शासन और प्रशासन को वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं मिल सकी। इसी वजह से उसने अब मुख्यमंत्री से पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। इस पूरे प्रकरण ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और विभागों के बीच समन्वय पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सरकार गरीब परिवारों को आवास और भूमि उपलब्ध कराने के लिए योजनाएं संचालित करती है, वहीं दूसरी तरफ यदि उसी योजना के तहत आवंटित जमीन पर वर्षों बाद बना मकान अवैध बताकर गिरा दिया जाए तो जिम्मेदारी तय होना भी जरूरी है। पीडि़ता का कहना है कि यदि आवंटन में कोई गलती हुई थी तो उसकी जिम्मेदारी लाभार्थी परिवार पर क्यों डाली जा रही है। सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर भूमि आवंटित करने वाले अधिकारी और बाद में उसी भूमि को अवैध बताने वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली की भी जांच होनी चाहिए। आखिर गरीब परिवार को सरकारी योजना का लाभ देने के बाद उसी परिवार को अपने घर के लिए वर्षों तक अधिकारियों के चक्कर क्यों लगाने पड़े। रानी ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और अन्य लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए तथा उसके परिवार को राहत देते हुए आवंटित भूमि पर दोबारा मकान बनाने का अवसर दिया जाए। अब देखना होगा कि शासन स्तर से इस शिकायत पर क्या जांच बैठती है और जांच में सरकारी आवंटन, भूमि की स्थिति, बुलडोजर कार्रवाई तथा न्यायालय के आदेशों को लेकर सामने आए आरोपों की वास्तविकता क्या निकलती है।

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